शिक्षा का प्रसार
समाज में शिक्षा का व्यापक प्रसार करना।
संस्था का परिचय, इतिहास और समाज के सर्वांगीण विकास के लिए उसका स्थायी दृष्टिकोण।
विक्रम संवत की बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में खाण्डल विप्र जाति के महान लोगों ने जातीय पुनरुत्थान का अभियान शुरू किया। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अखिल भारतवर्षीय श्री खाण्डल विप्र महासभा की स्थापना की गई।
राजवैद्य पं. श्री रामजीलाल जी माटोलिया (कोटकपुरा निवासी) की प्रेरणा और सहयोग से, सासनी (अलीगढ़) निवासी रूथला बंधुओं तथा अन्य विद्वानों के सहयोग से यह कार्य हुआ। वैद्यराज पं. द्वारिका प्रसाद जी के विवाह के अवसर पर, वैशाख कृष्ण द्वितीया विक्रम संवत 1965 (1908 ई.) को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में इस महासभा की स्थापना की गई।
इस स्थापना में पं. श्री दुर्गादत्त जी विद्यारत्न (वृन्दावन) का भी विशेष योगदान रहा। स्थापना के दिन ही महासभा का पहला अधिवेशन श्री लक्ष्मणाचार्य जी शास्त्री की अध्यक्षता में मथुरा में सम्पन्न हुआ।
महासभा के माध्यम से खाण्डल विप्र समाज को अज्ञानता और कुरीतियों से बाहर निकालकर प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाया गया। आज यह समाज एक विकसित ब्राह्मण समाज के रूप में आगे बढ़ रहा है और महासभा के 100 वर्षों के गौरवशाली इतिहास का साक्षी है।
अखिल भारतवर्षीय श्री खाण्डल विप्र महासभा की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पूरे भारत में फैली खाण्डल विप्र जाति का विकास करना और समाज में फैली कुरीतियों को समाप्त करना है।
इसके लिए निम्न कार्य किए गए:
आज भी महासभा अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है और बदलते सामाजिक व राजनीतिक वातावरण में समाज को आगे बढ़ाने का काम कर रही है।
अखिल भारतीय श्री खाण्डल विप्र महासभा की स्थापना के बाद से इसका मुख्यालय समयानुसार परिवर्तित होता रहा है। वर्तमान में महासभा का मुख्यालय भारद्वाज आश्रम पुष्कर में स्थित है। महासभा की स्थापना के बाद से महासभा के तृतीय अधिवेशन (सन 1916) तक इसका कार्यालय सासनी (अलीगढ़) में रहा। इसके पश्चात सन 1916 से नवम अधिवेशन सन 1925 तक महासभा का कार्यालय दिल्ली में रहा। सन 1925 से महासभा के विशेषाधिवेशन सन 1941 तक महासभा का कार्यालय जयपुर में रहा।
जयपुर में सन 1941 में महासभा के विशेषाधिवेशन के लिये नये निर्णय के अनुसार महासभा का कार्यालय जयपुर से रावलखेडा (मध्यप्रदेश) स्थानान्तरित कर दिया गया। महासभा के दशम अधिवेशन (सन 1943) के निर्णय के अनुसार महासभा का कार्यालय खण्डवा से सुजानगढ़ (राजस्थान) में स्थानान्तरित कर दिया गया। महासभा के ग्यारहवें अधिवेशन (सन 1945) के बाद महासभा का कार्यालय रतनगढ़ (राजस्थान) रखा गया।
महासभा के ग्यारहवें अधिवेशन (सन 1945) के समापन पर श्री शंकराचार्य जी महाराज का चातुर्मास कार्यक्रम महासभा के लिये वरदान सिद्ध हुआ। उनके कार्यकाल में परम पूज्य प्रातः स्मरणीय श्री श्री 1008 स्वामी वीराचार्य जी महाराज उत्तराद्रिवली शालरिया मठ, डीडवाना (मारवाड़), श्री रामकृष्ण मठ पुष्कर और श्री बालमुकुन्द आश्रम पुष्कर ने अन्य जातियों के प्रेम का परिचय देकर पुष्कर स्थित अपनी सुरम्य धर्मशाला को खाण्डल जाति की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था अखिल भारतीय श्री खाण्डल विप्र महासभा को मिति मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष शुक्ल द्वार विक्रम संवत 2008 (दिनांक 23 नवम्बर 1951) को भेंट स्वरूप प्रदान किया।
इसके पश्चात से इस भवन में आज दिन तक महासभा का मुख्यालय स्थापित है। इस भवन के सभागृह में खाण्डल विप्र जाति के आदि पुरुष महर्षि भारद्वाज की मूर्ति सन 1956 में स्थापित किये जाने के पश्चात ही इसका नाम श्री भारद्वाज आश्रम रखा गया। इस भवन का सर्वप्रथम जीर्णोद्धार स्व. पं. रामेश्वर लाल जी बाबावाली ने सन 1968 में कराया था। स्व. पं. श्री रामेश्वर लाल जी बदेरा ने भारद्वाज आश्रम के अन्य भाग को सुन्दर बनाने में रु. 41000/- का आर्थिक सहयोग प्रदान किया था।
इस भवन में सन 1999 में श्री रामप्रसाद ओमप्रकाश भाटीवाला, मुंबई के सौजन्य से एवं तत्कालीन महासभाध्यक्ष श्री रामनिवास जी बागड़िया के कर कमलों से भगवान लक्ष्मीनारायण जी के मंदिर की स्थापना की गयी। इस भवन में महासभा के मुख्यालय के अतिरिक्त महासभा द्वारा समाज के छात्रों के लिये एक छात्रावास भी चलाया जा रहा है, जहाँ सामाजिक बालकों को प्रोत्साहन प्रदान कर आदर्श जीवन जीने का प्रशिक्षण सुचारू रूप से दिया जा रहा है।
भारद्वाज छात्रावास में प्रतिवर्ष 30-40 छात्रों को प्रवेश दिया जाता है। इन्हें रहना, आवास, भोजन, जल, बिजली आदि आधारभूत सुविधाएं निःशुल्क प्रदान की जाती हैं। इस छात्रावास को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से महासभा ने एक स्थायी कोष की स्थापना भी की है।
वर्तमान महासभाध्यक्ष श्री मोहनलाल जी बोचीवाल के नेतृत्व में अनेक सामाजिक बंधुओं व संस्थाओं ने प्रेरणा पाकर इस जीर्ण-शीर्ण भवन की मरम्मत कराने में पर्याप्त आर्थिक सहयोग प्रदान किया है, जिसके फलस्वरूप महासभा के पुराने मुख्यालय भवन को वर्तमान में नवीन व सुन्दर स्वरूप प्रदान किया जा रहा है।
साथ ही वर्तमान महासभा अध्यक्ष श्री मोहनलाल जी बोचीवाल द्वारा नवीन भूखंड भी क्रय किया गया है, जिसकी कीमत 2 करोड़ 25 लाख है। यह लगभग 4000 sq. ft. क्षेत्रफल का है, जिस पर नया भवन बनना प्रस्तावित है।
| क्र. | अध्यक्ष | अधिवेशन | वर्ष |
|---|---|---|---|
| 1 | पं. लक्ष्मणाचार्यजी शास्त्री | मथुरा | 1908 |
| 2 | पं. छीतरमलजी बोहरा, औरंगाबाद | वृंदावन | 1909 |
| 3 | पं. चिरंजीलालजी, रेवाड़ी | दिल्ली | 1916 |
| 4 | पं. शिवलालजी जोशी, रतनगढ़ | भिवानी | 1917 |
| 5 | पं. देवीलालजी झुंझुनोदिया, मूंडवा | हिसार | 1918 |
| 6 | स्वामी बाल मुकन्दाचार्यजी, डीडवाना | रतनगढ़ | 1919 |
| 7 | स्वामी बाल मुकन्दाचार्यजी, डीडवाना | फतहपुर | 1922 |
| 8 | पं. बख्तावरलालजी माठोलिया, फिरोजपुर | खण्डवा | 1923 |
| 9 | पं. सोमदेवजी माठोलिया, मथुरा | वाशिम | 1925 |
| 10 | पं. नन्दकिशोरजी माठोलिया, जयपुर | सुजानगढ़ | 1943 |
| 11 | पं. शठकोपाचार्यजी काछवाल, डीडवाना | नवलगढ़ | 1945 |
| 12 | पं. केदारमलजी गोवला, गुवाहाटी | पुष्कर | 1948 |
| 13 | पं. नन्दकिशोरजी माठोलिया, जयपुर | टोडाभीम | 1952 |
| 14 | पं. मांगीलालजी काछवाल, आकोला | लातूर | 1955 |
| 15 | पं. बद्रीनारायणजी निढाणिया, सोलापुर | धुलिया | 1958 |
| 16 | पं. गोपीलालजी रिणवा, पुणे | जयपुर | 1960 |
| 17 | पं. खेतूमलजी, रूंठला | ढाबावाली | 1965 |
| 18 | पं. बंशीधरजी माठोलिया, बीकानेर | पुष्कर | 1970 |
| 19 | पं. नन्दकिशोरजी श्रौत्रिय, जयपुर | किशनगढ़ | 1977 |
| 20 | पं. हीरालालजी सेवदा, बीकानेर | जोधपुर | 1982 |
| 21 | पं. रामनिवासजी बणसिया, जयपुर | डीमापुर | 1989 |
| 22 | पं. रामनिवासजी बणसिया, जयपुर | फतेहपुर | 1995 |
| 23 | पं. रामलालजी गोरसिया, जयपुर | जयपुर | 2002 |
| 24 | पं. रामलालजी गोरसिया, जयपुर | गुवाहाटी | 2006 |
| 25 | पं. प्रहलाद राय जी डिडवानियां, जोधपुर | मंचरियाल | 2010 |
| 26 | पं. संजय कुमारजी श्रौत्रिय, चेन्नई | कोटा | 2013 |
| 27 | पं. मुरारीलालजी गोरसिया, जयपुर | पुष्कर | 2018 |
| 28 | पं. रामेश्वरलालजी श्रौत्रिय, जयपुर | पुष्कर | 2022 |
| 29 | पं. मोहनलालजी बोचीवाल, पिलानी | पुष्कर | पट्टिका पर अस्पष्ट |

वर्तमान महासभा अध्यक्ष
मोहनलाल बोचीवाल
समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी और भविष्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण इन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है।
समाज में शिक्षा का व्यापक प्रसार करना।
विभिन्न क्षेत्रों में महासभा की शाखाएं स्थापित करना।
अधिक आबादी वाले शहरों में विद्यालय और छात्रावास खोलना।
विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देना।
शिक्षण फंड ट्रस्ट और जनकल्याण ट्रस्ट की स्थापना करना।
समाज के विकास और कल्याण के लिए कार्य करना।